डिलीवरी प्रतिशत क्या है?
जब किसी शेयर में दिन भर में खरीद-बिक्री होती है, तो उसमें से कुछ शेयर उसी दिन बेच दिए जाते हैं (इंट्राडे), और कुछ शेयर खरीदार अपने डीमैट खाते में ले जाता है। डिलीवरी प्रतिशत बताता है कि कुल ट्रेड हुए शेयरों में से कितने प्रतिशत शेयर डिलीवरी के लिए चिह्नित हुए।
गणना कैसे होती है
डिलीवरी प्रतिशत = (डिलीवरी योग्य मात्रा ÷ कुल ट्रेड हुई मात्रा) × 100
उदाहरण: किसी दिन 10 लाख शेयर ट्रेड हुए और उनमें से 6 लाख डिलीवरी के लिए चिह्नित हुए, तो डिलीवरी 60% हुई। यह आंकड़ा NSE हर ट्रेडिंग दिन के बाद अपनी आधिकारिक रिपोर्ट में जारी करता है।
वॉल्यूम और डिलीवरी में फर्क
- वॉल्यूम बताता है कि दिन में कितने शेयर ट्रेड हुए — यानी गतिविधि कितनी थी।
- डिलीवरी बताती है कि उस गतिविधि में से कितना हिस्सा डिलीवरी के लिए गया।
- दोनों में से कोई भी संख्या यह नहीं बताती कि किसने खरीदा, क्यों खरीदा या आगे क्या होगा।
सही तरीके से कैसे पढ़ें
- उसी शेयर के पिछले दिनों से तुलना करें। हर शेयर का सामान्य डिलीवरी स्तर अलग होता है — किसी के लिए 30% सामान्य है, किसी के लिए 70%।
- डिलीवरी प्रतिशत के साथ डिलीवरी मात्रा भी देखें। बहुत कम वॉल्यूम पर ऊँचा प्रतिशत भी छोटी भागीदारी हो सकती है।
- कीमत का व्यवहार साथ में देखें: कीमत ऊपर बंद हुई या नीचे? अगले कुछ सत्रों में स्तर टिका या नहीं?
- एक दिन का उछाल कमजोर सबूत है; कई सत्रों तक बनी रहने वाली ऊँची डिलीवरी ज़्यादा जानकारी देती है।
आम गलतियाँ
- ऊँची डिलीवरी को "बड़े निवेशक खरीद रहे हैं" का पक्का सबूत मान लेना।
- इंडेक्स बदलाव, ब्लॉक डील या कॉर्पोरेट एक्शन (बोनस, स्प्लिट) वाले दिनों को सामान्य दिन की तरह पढ़ना।
- सिर्फ एक संख्या देखकर निर्णय लेना, बिना कीमत, नतीजों और कंपनी के कारोबार को देखे।
TickerKhoj पर कहाँ देखें
हर शेयर के पेज पर पिछले 10 और 60 सत्रों की औसत डिलीवरी दी गई है, और आज का बाजार पेज पर उस दिन के सबसे बड़े डिलीवरी उछाल वाले शेयर दिखते हैं।